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हे जंभेसर

हे जंभेसर !

हे जम्भेश्वर कविता
हे जम्भेश्वर 


हे जंभेसर !

खड़कती खागां
तणतै तीर-कबाणां
भळकतै भाला
अर
बैवते रगत-नाळा विचै
कींकर सूझियौ थन्नै
अहिंसा रौ मारग?
कींकर उण सईकै में
थारै अंतस में फूटी प्रकृत री
हरियल कूंपळां?

हे विष्णुपंथी!!

अचाणचक कांई जची थारै
कै थैं--
नहं झाली करां कृपाण
नहं बखतर बांधिया तन ऊपरां
नहं सिर ढकियौ सिरस्त्राण
नहं चढ़ियौ किणी तुरंग
नहं कसी जीण समरांगणां
थैं छोड़ विकट भड़ां री राह
लीधौ भल
वाल्हो बुद्ध रौ पथ
महावीर रौ मग,
करुणा लै'राई थांरी आंख्यां
अंतस में सत रा निरझर फूटिया
वाणी सूं इमरत झारियौ
मरू-आंगण रै मांय |
थैं--- विगसायौ नंवौ पंथ
सबदां रै बळ सूं सींचतां |

हे धजवाहक धरम रा!!
थैं बिना सैंधव सजाया
बिना तेगां रै बळ
फगत वांणी सूं झुकायौ
सिकंदर लोदी नै
फगत सबदां सूं झुकाया
तुरक नागौर रा
अजमेर रै मल्लूखां 
थारा चरण चांपिया |

हे प्रकृत रा पुजारी!

थैं नहं लीधी जलमघूंट
नहं ई पलकां नै झपकाई
बरसां तक
थैं चराई गायां ओरणां
भजनां में भजियौ
नितप्रत ईस नै |
थैं-- बांधी ही पाळां सरवरां
ऊगाया हा हरियल रूंखड़ां
पाळ्या हा म्रिग गौरवें
पूजी ही प्रकृत प्रेम सूं |

हे सत्यव्रती !

आयौ हो जोधो थारै आंगणै
नगाड़ौ बैरीसाल थैं सूंपियौ
थन्नै तेड़ायौ रावल जैतसी
माडधरा रै मांय
'जैत-समंद' री पाळ
थैं साचैमन विस्णु नै सिमरियौ |

हे समराथळ धणी!!

थैं धवळै धोरै ऊपरां
तांणी ही तंदूरी तार
आपी ही ऊजळ सबदमाळ
दीधौ हो अहिंसा रौ संदेश
करूणा विगसाई कंवळै काळजै
रूंखां री कीधी रखवाळ
जीवां नै साचाणी जीवण आपियौ |

महेन्द्रसिंह सिसोदिया छायण
लेखक:
महेन्द्रसिंह सिसोदिया "छायण"

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